
बीते बीस सालों से महिला आरक्षण को ले कर चल रही बहस,तमाम मुद्दे , आखिरकार आधे-अधूरे परिणाम पर आकर ख़त्म हुआ। आधा-अधूरा इसलिए क्यूंकि राज्यसभा ने तो यह बिल पास किया ,लेकिन लोकसभा के "महान सदस्यों " ने तो पहले से ही विपरीत खड़े होने के संकेत दे दिए हैं । भारत जैसे देश में सबसे बड़ी विडंबना यही है कि किसी भी नए मत को स्वीकार करने में सालों लग जाते हैं और जब वो सर्वसम्मति से पास होता है , तो भारत अन्य देशों कि अपेक्षा उतने ही साल पीछे नजर आता है (जैसा कि महिला आरक्षण बिल के केस में है ) ।
कई विकसित और विकासशील देश ऐसे हैं जहाँ महिलाओ ने राजनीति में अपनी अलग पैठ बनायीं है (कनाडा, जर्मनी , इंडोनेसिया यह तक कि बंगलादेश में भी महिलाओ के लिए उचित सीटों का निर्धारण किया गया है)।लेकिन भारत में महिलाओ कि राजनीति में भागीदारी , राज्यसभा में ११.३३% और लोकसभा में ७.६% है ।
हैरानी तो तब होती है ,जब महिलाएं ही महिलाओ का साथ नै देती हैं । इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ ।वैसे ये कोई नयी बात नहीं है, क्यूंकि अगर आपको याद हो तो , सीपीऍम केरल कि प्रसिद्द "गोवारी अम्मा " कि उनके खुद के पार्टी सदस्यों के द्वारा हुई बेज्जती के बावजूद किसी भी महिला कार्यकर्ता ने आवाज़ उठाने कि कोशिश नहीं की। "जयललिता " के साथ हुए अभद्र व्यवहार (जब उनकी साड़ी फट गयी थी) के बाद भी किसी महिला कार्यकर्ता ने आपत्ति नहीं जताई। बीजेपी की पूर्व कार्यकर्ता "उमा भारती " को भी मीडिया ने बड़े ही अच्छे नाम से नवाजा "सेक्सी सन्यासिन" और एक बार फिर सभी ने नजरंदाज किया।
सवाल उठता है, क्यूँ ? और सीधा सा जवाब है , राजनीति में पुरुषों का आधिपत्य। जहाँ किसी भी महिला को अपना स्थान बनाने में सालों गुजर जाते हैं और अब जब ये स्थान उन्हें महिला आरक्षण बिल के रूप में मिल रहा है, तो दिल खोल कर स्वागत करने की जगह विरोध के स्वर सुनाई दे रहे थे और तोड़- फोड़ तो अपने देखा ही होगा । ये प्रयास कितना सफल हो पायेगा , ये तो लोकसभा के फैसले के बाद ही दिखाई पड़ेगा। मगर तब तक के लिए रह जाती हैं ढेरों आशंकाएं और आशाएं महिला शशक्तिकरण को ले कर...........................................
Pakaramu visiting and following your blog
ReplyDeleteyour views are really good. Politics is becoming dirty day by day. it is n example of political hypocrisy.
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